चलों फिर उनसे मिलते हैं…
चलों फिर उनमें घुलते हैं…
चलों फिर उनसे मिलते हैं…
चलों फिर उनमें घुलते हैं…
जानते हैं वो उतना प्यार नहीं करते,
फिर भी हम उनके रास्तों पे चलते हैं।
हर बार दिल समझाता है —
अब अकेले ही संभलते हैं,
पर उनकी एक झलक मिलते ही
फिर से वहीं पिघलते हैं।
सोचा था इस बार बच जाएंगे,
ठोकरों से दूर निकलते हैं,
पर दिल है कि मानता ही नहीं —
फिर उसी खाई में फिसलते हैं।
टूटते हैं, बिखरते हैं,
कुछ दिन खुद में ही सिमटते हैं,
फिर ना जाने कैसी चाह उठती —
और फिर उनसे मिलने चलते हैं।
शायद यही मोहब्बत है…
या आदत सी पड़ गई है,
दर्द जानते हुए भी
उसी दर्द में हम पलते हैं…
चलों फिर उनसे मिलते हैं…
चलों फिर उनमें घुलते हैं…
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